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Sunday, 8 November 2026
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ई-नगर पालिका 2.0 बना भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी का अड्डा — नगर प्रशासन पूरी तरह चरमराया

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प्रदेश में नगरीय प्रशासन की ऑनलाइन व्यवस्थाएं लगातार अव्यवस्थित और बदहाल होती जा रही हैं। पहले से संचालित ई-नगर पालिका पोर्टल को अचानक बदलकर “ई-नगर पालिका 0.2” लागू कर दिया गया, लेकिन बिना पर्याप्त तकनीकी तैयारी, परीक्षण और प्रशिक्षण के लागू किए गए इस सिस्टम ने नगर पालिकाओं की कार्यप्रणाली को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है।

नेता प्रतिपक्ष ने आरोप लगाया है कि प्रदेश में लगातार नए-नए पोर्टल, ऐप और वेबसाइट केवल कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार के उद्देश्य से तैयार करवाए जा रहे हैं। पुराने सिस्टम को सुधारने के बजाय हर एक-दो वर्ष में नया पोर्टल लागू किया जा रहा है, जिससे यह आशंका गहराती जा रही है कि अधिकारियों और निजी कंपनियों की मिलीभगत से करोड़ों रुपए के ठेके बांटे जा रहे हैं।

नगर पालिकाओं के कर्मचारियों को नए सिस्टम की पर्याप्त ट्रेनिंग तक नहीं दी गई। हालत यह है कि एक ही जानकारी को कई-कई बार अपलोड करना पड़ रहा है, उसके बाद भी डेटा सेव नहीं हो रहा। कई नगर पालिकाओं की साइटें पहले भी 2 महीने से अधिक बंद रह चुकी है और अभी वर्तमान में भी 15 दिन से अधिक समय से बंद पड़ी हैं, ई-अटेंडेंस प्रभावित है, ऑनलाइन सेवाएं ठप हैं और कर्मचारी भारी परेशानियों का सामना कर रहे हैं।

सबसे गंभीर स्थिति भुगतान व्यवस्था की बनी हुई है। नगर पालिकाओं से नियमित भुगतान नहीं हो पा रहे हैं, जिसके कारण दैनिक उपयोग की सामग्री खरीदने में परेशानी आ रही है। सफाई व्यवस्था, निर्माण कार्य और विकास योजनाओं से जुड़े ठेकेदारों के भुगतान अटक गए हैं, जिससे कई विकास कार्य ठप पड़ने की स्थिति में पहुंच गए हैं।

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि यदि पुराना ई-नगर पालिका पोर्टल सुचारु रूप से कार्य कर रहा था तो आखिर इतनी जल्दबाजी में नया सिस्टम लागू करने की आवश्यकता क्या थी? जनता यह जानना चाहती है कि:

बार-बार पोर्टल बदलने के पीछे वास्तविक कारण क्या हैं?

– नए सिस्टम और ऐप निर्माण पर अब तक कितना खर्च किया गया?

– किन निजी कंपनियों को ठेके दिए गए?

– क्या इन परियोजनाओं में कमीशनखोरी हुई है?

– तकनीकी विफलताओं और प्रशासनिक अव्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी है?अमर रोचलानी ने आरोप लगाया गया है कि अधिकारियों और निजी कंपनियों की सांठगांठ से करोड़ों रुपए की परियोजनाएं बनाई जा रही हैं, जिनका भुगतान सरकार द्वारा जनता के टैक्स के पैसे से किया जाता है। यदि बार-बार सिस्टम बदलने के बाद भी व्यवस्थाएं ठप पड़ रही हैं, तो यह सीधे तौर पर जनता के धन की बर्बादी और गंभीर प्रशासनिक भ्रष्टाचार का मामला है।

 

डिजिटल व्यवस्था के नाम पर यदि नगर प्रशासन ठप हो जाए, कर्मचारियों को काम करने में दिक्कत हो, जनता की सेवाएं प्रभावित हों और विकास कार्य रुक जाएं, तो यह प्रदेश सरकार की गंभीर प्रशासनिक विफलता मानी जाएगी।

 

प्रदेश सरकार को चाहिए कि तत्काल तकनीकी खामियों को दूर कर सरल एवं स्थायी व्यवस्था लागू करे, अन्यथा जनता, कर्मचारियों और ठेकेदारों में बढ़ता आक्रोश बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है।

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