एक सुन्दर सी हवेली उसके चारों तरफ बहुत बड़ा गार्डनथा गार्डन मे रंग बिरंगे फूलो के पौधे लगें हुए थे। कई तरहा के फलो के भी पेड़ लगें हुए थेहवेली मे मौजूद गार्डन हवेली की सुंदरता को बढ़ाता था। गार्डन मे सुबह से कई तरहा के पंछी का आना जाना रहता था।

हवेली के सामने एक दलान था। दलान मे एक सोने का पिंजरा टंगा हुआ था। पिंजरे में एक तोता कैद था हवेली के सब रहवासी उसे प्यार से मीनू कहते ये ।
सब मीनू को बहुत ज़्यादा प्यार करते थे । मीनू के जरा से बोलने पर उसके सामने ताज़ा फल और जायेके दार खाना आ जाता था। सब मीनू की किस्मत पर रस्क खाते थे । कई लोग मीनू के सामने ही कह देते तोते ने क्या किस्मत पाई है राजाओं जैसी ज़िन्दगी जी रहा हैं। लोगों की बात सुनकर मीनू उदास हो जाता और सुनी सुनी आँखो से खुलें आसमान की तरफ देखने लगता।
कभी कभी वो तन्हाई में अपने परों को फड़फड़ता और बहुत तेज़ चिल्लता। अपनी छोटी सी टोच से पिंजरे की जाली को काटने की ना कामयाब कोशिश करता कभी कभी उसकी आँखो में बेतहाशा आसु आ जाते।
वो इस कैद से आजादी की ज़िन्दगी जीना चाहता था।
लेकिन हवेली में मौजूद लोग यहीं सोचते वो मीनू को इतने प्यार से रखते हैं उससे इतना ज्यादा प्यार करते है इसलिए मीनू उनके साथ बहुत खुश है।
मीनू को तो याद भी नहीं था वो कब इस पिंजरे का कैदी बन गया था वो बहुत छोटा था उसके पर भी नहीं निकले थे तब ही से बिना किसी जुल्म के उसको ये कैद की सजा मिल गई थी चाहकर भी जिससे वो आजाद नहीं हो पा रहा था।
जैसे जैसे इस कैद में मीनू के दिन गुजरते जा रहे थे मीनू की उम्मीद टूटती जा रही थी। एक दिन मीनू युही उदास बैठा था । अमरुद के पेड़ पर आकर एक बुलबुल बैठी और अमरुद खाने लगी।
मीनू अक्सर उसे यहा आते जाते देखता था । लेकिन आज बुलबुल को देखकर मीनू को एक उम्मीद की रौशनी नजर आई । उसने बुलबुल से कहा बुलबुल बहन बुलबुल बहन …।
बुलबुल ने गुस्से से मीनू की तरफ देख कर कहा क्या हुआ भाई क्यो इतनी जोर जोर से चिल्ला रहे हो कभी तुम्हारे मालिक ने सुन लिया तो मेरी खैर नही।
बुलबुल बहन मुझें तुम्हारी मदद की जरूरत है क्या तुम इस पिंजरे की कैद से बहार निकलने मे मेरी मदद कर सकती हो।
मै भी खुले आसमान में तुम्हारी तरहा उड़ना चाहता हूँ तुम्हारी तरहा दूर दूर की लम्बी लम्बी उड़ान भर कर पुरी दुनियां देखना चाहता हूं। आजादी की हवा मे सास लेना चाहता हू। अपनी मर्जी से खाना खाना चाहता हूं ।
अरे भाई तुम क्यो इस कैद से आजाद होना चाहते हों ? जानते भी हो तुम बहार की दुनियां कितनी मुश्किलों से भरी हुई है।
यहां तुम्हे आसानी से ताजा फल और लजीज पकवान
खाने को मिल जाते हैं। बहार की दुनियां में हमें बहुत मुश्किल से खाना मिल पाता है।
कड़के की ठंड हो या बारिश का गिरता पानी हो या शरीर को जला देने वाली गर्मी हो हमें रोज़ सुबह प्रभात से उठकर ही खाने की तलाश करनी पड़ती हैं। तब जाकर थोड़ा बहुत खाना मिल पाता हैं।
तुम नही जानते हो भाई हमारे साथी युही खाने पीने की तलाश में ही मर जाते है।
हमारा अशियाना भी इतना मजबूत नहीं होता हैं। जरा सी तेज़ हवा से तिनखे तिनखे बनकर बिखर जाता है
आज कल तो शहरों मे रहना इतना आसान नहीं है हमारे लिए इंसानों ने पेड़ो को कट कर बड़ी बड़ी बील्डिंग बना ली है।
पहले इंसानो के घरों के सामने आँगन में पेड़ होते थे जिन पर हम अपना घोंसला बना कर रहते थे अब ऐसा नहीं है।
बुलबुल बहन बहार की दुनियाँ कितनी ही मुश्किली से भरी है लेकिन आजादी का सुकून है वहा। मै आजादी की ज़िन्दगी जीना चागता हु।
आजादी की दुनियाँ में अगर मुझें ये फल और लजीज पकवान नहीं भी खाने को मिले मै भूखा रह लूंगा कंकर पत्थर खा लूंगा लेकिन कैद में नहीं रहना चाहता हूँ।
आजादी से सब को प्यार होता हैं। चाहे ज़िन्दगी कितनी भी मुश्किलों से भरी हो लेकिन आजादी की ज़िन्दगी में सुकून है। वो सुकून कैद में नहीं मिल सकता है।
अच्छा मुझें  बताओ क्या तुम खुश नही हो आजादी की ज़िन्दगी से?
नहीं भाई मै तो बहुत ज्यादा खुश हूं। माफ करना भाई मै तुम्हें इस कैद की ज़िन्दगी से आजादी दिलाने की पुरी
 कोशिश करुँगी।
फिर बुलबुल ने अपनी टोच से पिंजरे के गेट को खोलने की कोशिश की। इस वक्त मीनू बस उसे हसरत भारी निगाहों से देख रहा था।
बहुत कोशिश करने के बाद बुलबुल पिंजरे का गेट खोलने मे कामयाब हो गई और उसने मीनू को आजाद कर दिया।
मीनू ने पहली बार बुलबुल के साथ उठान भरी लेकिन वो बुलबुल जितना तेज़ नहीं उठ पा रहा था। सालो से कैद रहने से उसके पर खराब हो गये थे
लेकिन बुलबुल ने उसे हिम्मत दिलाई और उसे अपने साथ लेकर अपने घोंसले पर पहुंची।
अब मीनू रोज़ थोड़ा थोड़ा उड़ने की कोशिश करता ताकि वो भी बुलबुल की तरहा खुले आसमान मे उड़ सके।
आखिर बहुत कोशिश के बाद वो वक्त आ ही गया जब मीनू के पर खुली हवा मे रहने से ठीक हो गये और वो लम्बी लम्बी  उड़ान भरने लगा । अब मीनू बहुत ज्यादा खुश था । वो अपनी आँखो के हर खबाब को पुरा करना चाहता था।

सैयद शबाना अली

हरदा मध्य प्रदेश

Leave a Reply