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Saturday, 7 November 2026
कहांनियां

Story : ख़ाली हाथ 

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कहानी

ख़ाली हाथ 

आसमान की जिन उचाईयों को छूने की हर इंसान तमन्ना रखता हैं। जिन उचाईयों को बस छूकर गुजर जाने के एहसास से ही हर कोई खुशियों से झुम उठता है। वो सारी खुशियां उसके पास थी। नाम शोहरत प्रसिद्धि दौलत का कभी ना ख़त्म होने वाला अम्बार।

मुंबई के जुहू में समुद्र के किनारे एक महल की से आलीशान बंगला बना था उसका । हर दिन हजारों लोग  बस उसका एक बार दीदार करने के लिए दूर दूर से मुंबई आते और अगर उसकी एक झलक देख लेते तो खुशी से झूम उठतें। दुनियां का हर इंसान उसकी क़िस्मत पर रस्ख खाता।
ऐसी शान शौकत से भारी हुई थी शिखर की जिंदगी। वो यादों के झरोखें में झककर देखता है तो 20 साल पहले जब वो मुंबई आया था आँखो में हजारो ख्वाब थे। लेकिन ख़ाली हाथ था वो
ज़िन्दगी ने उसके सारे अरमान पूरे कर दिये दुनियाँ का सब कुछ है उसके पास फिर भी वो आज भी ज़िन्दगी में ख़ाली हाथ है।
क्या पाया और क्या छुट गया हर पल तन्हाई में यही सोचता रहता है वो। दुनियाँ की सारी खुशियाँ तो  उसके पास थी। फिर भी क्यो ज़िन्दगी में सुकून के दो पल के लिए तरसता है वो ?
जब ख़ाली हाथ था तो मुंबई की सड़कों पर दिन भर आजाद परिंदे की तरह घूमता रहता था वो। समुद्र के किनारे खड़े होकर घंटों समुद्र की इतलाती लहरों को देखता रहता था वो।
आज एक पल के लिए घर से निकलता हैं तो हज़ारों लोग आकर घैर लेते हैं उसको । फिर भी क्यों इतना ज़्यादा तन्हा है वो? दो पल ज़िन्दगी में सुकून के मिल जाये इसी आस में ज़िन्दगी जी रहा है वो।
सब कुछ पाने के बाद क्यों ख़ाली हाथ है वो यही सोचता रहता है। आज ज़िन्दगी के मायने समझ आ गये है उसे ज़िन्दगी में दौलत शोहरत प्रसिद्धि कुछ भी इंसान के काम नहीं आती है जब ज़िन्दगी में सुकून ना हो।
इंसान के पास कितनी भी दौलत हो शोहरत हो लेकिन जैसे वो दुनियां के सामने मुस्कुरा रहा है ऐसे ही अगर अपनी तन्हाइयो में भी मुस्कुरा रहा हो तभी ज़िन्दगी में असली कामयाबी हासिल हो सकती हैं।
आज इसी कश्मकश में खोय हुये शिखर को नींद नही आ रही थी। रात का दरम्यानी पहर शुरु हो गया था। नींद थी जो उसकी आँखो से कोसों दूर जा चुकी थी।
वहा बेचैनी में अपने आलीशान महल में बिस्तर पर युही करबते बदल रहा था।
फिर वो अचानक उठ कर बैठ गया और सिधे घर से बाहर निकल गया। और अपनी गाडी में बैठ कर मुंबई की जागी जागी सड़को को युही तन्हा छोड़कर वो शहर से बहार निकल गया था।
अब जिस मुकाम पर वो चल रहा था। वहा सिर्फ़ वो था और उसकी तन्हाई थी। अपनी तन्हाइयों के साथ साथ चलते चलते वो कितनी आगे निकल गया था उसे एहसास ही नहीं हुआ।
अपनी तनहाइयों के साए में चलते-चलते शिखर एक ऐसे मोड़ पर आ कर रुका एक उम्मीद की रौशनी की झिलमिलाहट उसी नजर आई
खामोशी में सिमटा हुआ उसका वजूद वहां आ ना रुक सा गया जहां वो रुका था वहा कुछ खानाबदोश परिवार अपनी खुशियों में मगन थे
उनकी खुशियों को देखकर शिखर वहीं थम सा गया
वह सोच रहा था कैसे हैं यह लोग कुछ नहीं है इनके पास फिर भी कितना खुश है ये क्या दुनिया में सब कुछ  होना ही खुशी देता हैं
या अपने मन की खुशी इंसान को खुशी देती है
 कहने को तो ये खाली हाथ है लेकिन असल मायेने मे तो मै ही खाली हाथ हू।

सैयद शबाना अली

हरदा मध्य प्रदेश

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