आजादी की शम्मा को अपने दिलो में जला कर जो दीवाने अपने सरो पर कफ़ान बन्दे अपने घरो से अपनी  मातृभूमि को आजादी की चुनर हुड़ाने निकले थे।

मातृभूमि को आजादी की चुनर हुड़ाने निकले थे। वो दीवाने कुछ और थे
उनके दिलो में मौत का खौफ नहीं था बस उनकी आँखो में अपनी धरती मां के सुनहेरी भविष्य का ख़ब्ब था जिसे वो बस अपनी आँखो से सच होते देखना चाहते थे। वो धरती माँ जिसकी अंचल की छाव मे वो रहकर वो पले थे आँखो में बस एक ही ख़ब्ब था एक दिन हम अपनी धरती माँ को गुलामी की इन जंजीरो से आजाद करायेगे
अपनी आँखो के इस सुनहेरी ख्वाब को पुरा करने के लिये लाखों ने हसते हसते अपनी ज़िंदगी कुर्बान कर दी और अपने होठो पर उफ़ तक ना आने दी । आज हम आज़ाद भारत मे जिस हक के साथ अपनी ज़िंदगी शान और शौकत के साथ जी रहे हैं ये सब उन दीवानों के सदके ही हमे नशीब हुआ है।
हम चाहकर भी उनके खुन के एक कतरे की क़ीमत नही चुका सकतें है। मौत को सामने देख कर डर से कापने वाले हम क्या उन लोगो के फुलादी हौसलों की कद्र कर पायेगे जो अंग्रेजो के लाखों जुल्म और सितम पर मिल का पथ्थर साबित हुए ।
अंग्रेज अपनी जुल्म की इंतेहा पर थे ये दीवाने यू सब्र का दामन थामे हुय थे। इनके हौसलों की बुलंदी के आगे जुल्म भी सिष्क के रह जाता था ।
अपने आपको अपनी मातृभूमि का सुपूत कहने वाले ये दीवाने  काटो पर चलकर भी अपनी मातृभूमि को आजादी की चुनार हुडा गये। दुनिया लोगों ज़िंदगी जिने का वो अंदाज़ सिखा गये सालों के फेर के बाद भी जिसका कोई सानी नहीं मिलेगा।

सैयद शबाना अली

हरदा मध्य प्रदेश 

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