सात एकड़ से एक करोड़ की आमदनी
हरदा में फल-फूल रहे चाइना, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, मलेशिया के फल
हरदा जिले ने उन्नत कृषि के क्षेत्र में हमेशा ही कीर्तिमान स्थापित किए हैं। आज हम बात कर रहे हैं ग्राम कुहिग्वाड़ी के किसान शंकर सोलंकी द्वारा की जा रही उद्यानिकी कृषि और नर्सरी से महज सात एकड़ भूमि से सालाना एक करोड़ रुपए आय अर्जित करने की। जी हां, आप सही पढ़ रहे हैं। यह एक करोड़ सालाना आय ही लिखीं हैं, यह हम नहीं कह रहे, बल्कि स्वयं किसान शंकर सिंह सोलंकी ने हमें बताया है। इतना ही नहीं बल्कि उनका कहना है कि वह महज दो से तीन साल में इसी जमीन से चार करोड़ रुपए सालाना की आमदनी प्राप्त करेंगे। इसकी पूरी तैयारी हो चुकी हैं। शंकर सिंह सोलंकी को परंपरागत कृषि से हटकर उद्यानिकी कृषि अपनाते हुए किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बनने पर पूर्व में अनेक पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। भारत सरकार सहित तात्कालीन प्रदेश सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान तथा उनके अनेक मंत्रियों व वरिष्ठ अधिकारियों ने उनकी कृषि तकनीक को सराहते हुए अवलोकन भी किया है। आज शंकर सिंह सोलंकी हरदा की भूमि पर चाइना, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, मलेशिया जैसे अनेक देशों के फलों का उत्पादन भी कर रहे हैं और उनके पौधे तैयार कर अन्य किसानों को प्रदान भी करते हैं। वह जापान का मिया जाकी प्रजापति का आम भी उत्पादित कर रहे हैं, जिसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में दो लाख रुपए किलो है।
कुछ करना है, तो डटकर चल।
थोड़ा दुनियां से हटकर चल।
लीक पर तो सभी चल लेते है,
कभी इतिहास को पलटकर चल।
बिना काम के मुकाम कैसा?
बिना मेहनत के, दाम कैसा?
जिले के ग्राम कुहिग्वाड़ी निवासी किसान शंकर सिंह सोलंकी ने शायद किसी शायर की इन पंक्तियों को आत्मसात करते हुए परंपरागत कृषि से हटकर उद्यानिकी कृषि को अपनाया है। शंकर सिंह ने किसी कृषि महाविद्यालय से कृषि विज्ञान का अध्ययन नहीं किया है और न ही उन्हें सरकार के किसी कृषि अधिकारियों ने मार्गदर्शन देकर यह कार्य कराया है। शंकर सिंह तो महज आठवीं कक्षा तक पढ़ें लिखे, विशुद्ध देहाती किसान हैं। जिन्होंने सन 1996 से ही परंपरागत कृषि से हटकर उद्यानिकी कृषि को अपनाना शुरू कर दिया था। पहले उन्होंने आंवला उत्पादन और आंवले के उत्पाद तैयार कर ख्यातिप्राप्त की थी। जिसके चलते उन्हें अनेक पुरस्कार भी प्राप्त हुए। जब आंवले के वृक्षों का जीवन चक्र पूरा होते हुए उनकी पैदावार घटने लगी तो उन्होंने बगैर समय गवांए सीधे चीकू, अमरुद और आम का उत्पादन करना शुरू कर दिया। इसी के साथ उन्होंने स्वयं नर्सरी तैयार करते हुए देश और विदेशों की विभिन्न प्रजातियों के पौधे तैयार करने की तकनीक प्राप्त की। स्वयं के व्यय पर विभिन्न कृषि इंस्टीट्यूट का भ्रमण कर वहां से प्रमाणित प्रजातियां तथा उसके पोंधे तैयार करने की विधि हासिल की। शंकर सिंह बताते हैं कि आज वह 32 प्रकार की विभिन्न प्रजातियों के फलदार पौधे तैयार कर न केवल उनका उत्पादन प्राप्त कर रहे हैं, बल्कि पौधे भी बेचते हैं। उन्होंने जहां स्वयं अपनी 7 एकड़ भूमि पर 32 प्रजातियों के लगभग 5200 पेड़ लगा रखे हैं, तो वहीं अभी तक अलग अलग किसानों की 6 हजार एकड़ भूमि पर बगीचे लगवा चुके हैं। मध्यप्रदेश के अनेक आईएएस, आईपीएस तथा आईएएफ अधिकारी भी शंकर सिंह से अपनी निजी भूमि पर बगीचे लगवा चुके हैं।
प्रदेशों में भी जाते हैं शंकर सिंह की नर्सरी के पौधे
शंकर सिंह सोलंकी द्वारा उत्पादित फल जहां प्रदेश और देश की राजधानी तक बिक्री हेतु जाते हैं, तो वहीं उनकी नर्सरी में तैयार पौधे गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान आदि प्रदेशों में भी बड़ी तादाद में जाते हैं। मध्यप्रदेश सरकार के विभिन्न विभागों की पौधरोपण योजनाओं में भी शंकर सिंह की नर्सरी रजिस्टर्ड है और पौधे प्रदान करती है। उनका कहना है कि उनके पौधे शत-प्रतिशत प्रमाणित और गुणवत्ता युक्त उत्पादन देने वाले होते हैं। वह पौधों को बच्चों जैसा पालते पोसते है। वह उन्हें कहते भी बच्चे ही हैं। उन्होंने हमें बताया कि अभी मेरे पास कौन कौन सी प्रजातियों के बच्चे हैं, जो आने वाले समय मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेंगे।
अब चार करोड़ सालाना कमाई का प्रयास
वर्तमान में शंकर सिंह सोलंकी की नर्सरी में तथा उनके खेत में जापान का मिया जाकी प्रजाति का आम लगा हुआ है। जिसमें फल भी लगें हैं। यह आम भारत में लगभग साढ़े चार से पांच हजार रुपए किलो तक बिकता है, तो वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत दो लाख रुपए किलो तक है। इसी जापान का ही बगैर गुठली वाला आम ब्लैक स्टोन, अमेरिकन रेड परपल, आस्ट्रेलिया का रेड आई बरी, क्यो आफ चका पाट, थाईलैंड का आई टाइम जो वर्ष में चार बार फल देता है, बनाना मेंगो जो वर्ष में दो बार फल देता है। ऐसी अनेक प्रजातियां मौजूद हैं और उनमें फल भी लगें हैं, जिनके नाम हमने कभी सुने नहीं थे तथा अब याद भी नहीं रहें। इसी तरह अमरुद में पिंक थाइलैंड, रेड डायमंड, इलाहाबादी सफेदा, मलेशिया का नारियल, वाटर एप्पल, चाइना लीची, स्टार फू्रट, टेन केजी जामून आदि 32 प्रजातियों के फल और उनके पौधे मौजूद हैं। शंकर सिंह सोलंकी का कहना है कि लोग आखिर कब तक परंपरागत खेती को लेकर बैठे रहेंगे? हर बार किसी न किसी कारण से फसल खराब होती है या अच्छी पैदावार हुई तो भाव नहीं मिला, फिर किसान सरकार के सामने भिखारी जैसा हाथ फैलाता है, यह सब कब तक करते रहेंगे। उनका कहना है कि किसान राजा था और राजा ही बनकर रहना चाहिए। हम दूसरों का पेट भरने वाले हैं। मांगने वाले क्यों बनें? देने वाले बनकर दिखाएं। धरती मां का श्रृंगार वृक्षों से करके तो देखो वह आपका जीवन श्रंृगार देंगी। उन्होंने कहा कि मैं वर्तमान में चीकू और अमरुद से लगभग 50 लाख रुपए सालाना आय प्राप्त करता हूं। वहीं कुछ अन्य प्रजातियों के फलों से और नर्सरी के पौधों से सब मिलाकर एक करोड़ सालाना आय प्राप्त हो जाती है। लेकिन अब मेरे बच्चे ( पौधे) अगले दो वर्षों में मुझे इसी धरती से चार करोड़ रुपए सालाना देने को तैयार हो गये है। मेरे आम के बगीचे भी इस वर्ष से अच्छा उत्पादन देना शुरू कर चुके हैं। आप देखेंगे कि अब हर वर्ष आमदनी बढ़ती जाएगी। उन्होंने किसानों से आव्हान किया है कि वह उनके बगीचे में आएं, यहां देखें कैसे खेती आनंद के साथ आय प्रदान करती है।
स्मृतियों में पौधे का वितरण
शंकर सिंह सोलंकी ने बताया कि वह अपने समाज में किसी के निधन या शादी के अवसर पर यादगार के तौर पर दिए जाने वाले वर्तनों के स्थान पर पौधे भेंट करने की परंपरा भी शुरू कर चुके हैं। इसी तरह विभिन्न धार्मिक स्थलों पर भी उन्होंने हजारों नि:शुल्क पौधे भेंट कर लगवाएं है। लोग अगर इस तरह पौधे लगाने लगेंगे तो हमारी धरती मां फिर भरी हो जाएगी। वहीं इससे केवल हमारा ही पेट नहीं भराएगा, बल्कि उन बेजुबान पक्षियों, कीट पतंगों के लिए भी हमारी ओर से भंडारा चलता रहेगा। हमें लोग धरती पुत्र कहते हैं तो हम धरती मां का श्रृंगार वृक्षों से करें। वह हमारे भंडार पैसों से भर देगी। फिर किसान बेचारा ही बनकर क्यों रहे, व्यापारी बनकर ठाठ करें। जैसे आज मैं कर रहा हूं। व्यापार कृषि पर आधारित करो, खुद पैदा करें और खुद ही उसका माल बनाकर बेचें। नौकरी मांगने वाले की जगह नौकरी देने वाले बन जाएंगे।

