37.50 लाख के पंचायत भवन में भ्रष्टाचार का खेल? घटिया निर्माण पर उठे बड़े सवाल

जनपद सीईओ चेतना पाटील के कार्यकाल की जाँच की उठ रही मांग.. 

ग्रामीणों का आरोप – सचिव और इंजीनियर की मिलीभगत से कमीशनखोरी, गुणवत्ता से समझौता

पावनसिटी टिमरनी।

जनपद पंचायत टिमरनी की ग्राम पंचायत पाडरमाटी में लगभग 37 लाख 50 हजार रुपये की लागत से बन रहे पंचायत भवन को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। ग्रामीणों का दावा है कि निर्माण कार्य में भारी अनियमितताएं बरती जा रही हैं और सरकारी राशि के दुरुपयोग का खुला खेल चल रहा है। आरोपों के केंद्र में ग्राम पंचायत सचिव विनोद कहार और उपयंत्री सी.बी. सोनी हैं, जिन पर कथित रूप से कमीशनखोरी के लिए निर्माण गुणवत्ता से समझौता करने के आरोप लगाए जा रहे हैं।

ग्रामीणों के अनुसार पंचायत भवन में उपयोग की जा रही सामग्री निर्धारित मानकों से काफी नीचे स्तर की है। आरोप है कि निर्माण में घटिया सीमेंट, निम्न गुणवत्ता की ईंटें और रेत का इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि स्वीकृत इस्टीमेट के अनुरूप सरिया भी नहीं लगाया जा रहा। सबसे हैरानी की बात यह बताई जा रही है कि भवन का बड़ा हिस्सा खड़ा हो चुका है, लेकिन गुणवत्ता को लेकर उठ रहे सवालों का अब तक कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला है।

कमीशन के लिए कमजोर बना रहे भवन?”

ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण कार्य की तकनीकी निगरानी की जिम्मेदारी संभाल रहे इंजीनियर सी.बी. सोनी और पंचायत सचिव की कथित मिलीभगत से यह पूरा खेल चल रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि निर्माण कार्य की निष्पक्ष जांच हो जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।

ग्रामीण यह भी आरोप लगा रहे हैं कि जनपद पंचायत की जिम्मेदार व्यवस्था और अधिकारियों को मामले की जानकारी होने के बावजूद कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की जा रही, जिससे भ्रष्टाचार को खुला संरक्षण मिलने की चर्चाएं गांव में तेज हो गई हैं।

भवन बना तो रहा है, लेकिन कितना सुरक्षित?”

गांव के लोगों का कहना है कि यदि निर्माण कार्य इसी तरह चलता रहा तो भविष्य में यह भवन किसी बड़े हादसे का कारण बन सकता है। पंचायत भवन जनता की सुविधा और प्रशासनिक कार्यों के लिए बनाया जा रहा है, लेकिन शुरुआत से ही गुणवत्ता पर सवाल उठना गंभीर चिंता का विषय है।

ग्रामीणों की प्रमुख मांगें

निर्माण कार्य में उपयोग की गई सामग्री की स्वतंत्र जांच हो।

कॉलम, बीम और छत में लगाए गए सरिया की तकनीकी जांच कराई जाए।

पूरे निर्माण कार्य का तकनीकी ऑडिट कराया जाए।

दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों, इंजीनियर और सचिव पर सख्त कार्रवाई की जाए।

निर्माण कार्य की गुणवत्ता की निगरानी उच्च स्तरीय टीम से कराई जाए।

सबसे बड़ा सवाल

जब 37.50 लाख रुपये की लागत से पंचायत भवन बनाया जा रहा है, तो क्या जनता के पैसे से बनने वाला यह भवन गुणवत्ता की कसौटी पर खरा उतरेगा या फिर कमीशनखोरी की भेंट चढ़ जाएगा?

अब निगाहें जिला प्रशासन और जनपद पंचायत के जिम्मेदार अधिकारियों पर हैं कि वे इन गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाते हैं या मामला भी अन्य शिकायतों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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