अपनी जिन्दगी में उम्मीदों के चिरांगों को जलाएं हुए। आज चार साल बाद फिर में अपने घर जा रही हूं। इस उम्मीद के साथ सालों से अपनों के प्यार के लिए तरसते हुये मेरे इस दिल को मेरे अपनों का वही प्यार मिल पाएगा। जिसे चार साल पहले में पीछे छोड़ आई थी।
इन खुशियों भरे मौसम में दिल आज मुझे उन यादों में खिंच कर ले जा रहा है। जब मैं अपने अपनों के साथ थी। कितने खुशनुमा थे वो पल जब हम सब साथ थे।
मुझे आज भी वो दिन याद है जब कोट में मैंने अपने पहले कैस को जीता था। मैं उस दिन बहुत खुश थी। सब मुझे पहली सफलता पर बधाईयां दे रहे थे। और मेरा मन अपने अपनों को मिलने के लिए तड़प रहा था। मैं यही सोच रही थी। वो पल कैसा होगा जब मैं माँ-बाबूजी को ये खुशी की खबर सुनाऊंगी।
आज मैंने अपने उनके ख्वावों को पुरा कर दिया है। उस दिन पहली बार मुझे मुम्बई से विदिशा का सफर बहुत लम्बा लग रहा था। उस पल को याद कर के आज भी उसकी यादों में खो जाती हूं। उस दिन जब में घर पहुंची थी। माँ-बाबूजी और अपने छोटे भाई आयूष का वो खुशी से खिलखिलाता चहेरा आज भी भुलाए नहीं भूल सकती हूं मैं।
बाबूजी…सुमन की माँ देखों सुमन आ गई है।
सुमन…सुमन तुमने पहले क्यों नहीं खबर दी के तुम आ रही हो। माँ अगर मैं पहले खबर कर देती के मैं आ रही हूं। आज मेरे अचानक यहां आने से आपके चहरे पर जो खुशी है। उसको मैं मिस कर देती।
माँ-बाबूजी मैं आपको आज इस तरह यहां अचानक आके बहुत बड़ी खुशी की खबर सुनाना चाहती थी। आज मैंने आपके और अपने सपनों की पहली मंझील को पार कर लिया है।
सच सुमन। हाँ बाबूजी आज मैंने अपनी जिन्दगी का पहला कैस जीत लिया है। बाबूजी आज आपकी बेटी मुम्बई जैसी बड़ी सीटी में एक सफल वकील के रूप मैं पहचानी जाने लगी है।
मैं बता नही सकती हूं बाबूजी आज मैं कितनी खुश हूं। माँ मुझे उस वक्त ऐसा लग रहा था के मैं सपनों में जी रही हूं। जब सब लोग मुझे मेरी सफलता की बधाई दे रहे थे। उस वक्त बस मेरी आंखों में आपका ही चहेरा घुम रहा था। माँ अब मैं इस सफलता को अपने हाथों से छुटने नहीं दूंगी। मैं और महेन्त करूंगी। अपने आपके ख्वावों की नई मंझील पर पहुंचाऊंगी।
सुमन हमें तुम पर गर्व है। हमें अपनी बेटी पर पुरा भरोसा है। हां बेटा मुझे उम्मीद है हमारी बेटी अब कभी पीछे मुडक़र नहीं देखेगी। महेन्त कर के अपनी महेन्त और लगन से सफलता की हर दिन नई मंझील को पाएगी।
माँ बाबूजी मुझे आपके इसी विश्वास की जरूरत है। बेटा हमारा विश्वास और अर्शिवाद हमेशा तुम्हारे साथ है।
बाबूजी आप सारा अर्शिवाद दीदी को दे देगें तो मुझे क्या मिलेगा। आयूष तु बहुत नटखट हो गया है। क्या सुमन और तुम हमारे लिए अलग-अलग हो। तुम दोनों ही तो हमारे जीगर के टुकड़े हो।
सुमन दीदी मैं बता नहीं सकता हूं कल जब आपने मुझे यहां आने के बारे में अपनी पहली सफलता के बारे में बताया तो मैं कितना खुश था। लेकिन मैं आपनी खुशी छुपा नहीं पा रहा था। और मैं कल से माँ -बाबूजी के सामने नहीं आ रहा था कही उनसे सब कुछ कर आपके किये वादे को न तोड़ दूं।
दीदी आज में आपके लिए बहुत खुश हूं। मैं यही चाहता हूं के आप हमेशा इसी तरह मुस्कुराती रहे और सफलता की नई ऊंचाईयों हो छुए जिसकी आपको बचपन से तमन्ना थी।
हाँ आयूष तू ठीक कहता है। मैं उस मुकाम को जरूर हासिल करूंगी। जिसके पास तेरे जैसा प्यार करने वाला भाई और इतना ज्यादा प्यार करने वाले माँ-बाबूजी हो। वो कैसे अपने जीवन मैं हार माने।
सच वो दिन कितने खुबसूरत थे। जब मेरी खुशियां मेरे अपने मेरे साथ थे। अपनों के प्यार के साये में दिन कब गुजरते जा रहे थे। पता ही नहीं चल रहा था।
लेकिन मुझे नहीं मालूम था एक दिन मेरी जिन्दगी ऐसा भी आएगा। जो मेरी जिन्दगी को पुरी तरह से बदल कर रख देगा। वो दिन मेरी जिन्दगी में बिखरे हुए अरमानों की अधुरी सच्चाई बनके रह गया है। वो अरमान जो राधा ने अपनी जिन्दगी के लिए सजाएं थे । वो दिन आज भी मैं भूल नहीं सकती हूं।
जब मैं अपनी घर की बालकानी मैं बैठ कर चाय पी रही थी। के अचानक मेरी निगाह राधा के घर की तरफ गई। मैंने देखा वहां बहुत भीड़ हो रही थी। मुझे समझमें नहीं आ रहा था। वो सब देखकर मेरा दिल न जाने क्यों घबरा रहा था।
सुबह से ही वैसे ही मुझे कुछ बैचनी हो रही थी। अब मुझ से रहा नहीं जा रहा था। मैं सीधे माँ के पास गई। माँ आज राधा के घर के बहार इतनी भीड़ क्यों हो रही हैं। क्या बात हैं। माँ। माँ आप चुप क्यों है बोलिए न क्या बात है?
आज सुबह से वैसे ही मेरा दिल घबरा रहा है। बताईए न क्या बात है। सुमन मैं तुम्हें कैसे बताऊं मैं सुबह से तुम्हें ये बात बताना चाहती थी। लेकिन मुझे समझ में नहीं आ रहा था मैं कैसे अपनी मजबूरी को तुम्हारी दोस्ती पर हाबी होने दे रही थी।
सुमन राधा नहीं रही। वो हम सब को छोडक़र हमेशा-हमेशा के लिए चली गई हैं। माँ आप ये क्या कह रही है। आप राधा के बारे में ऐसा कैसे कह सकती है। हां सुमन यही सच हैं। अपने आप को सभा लो। लेकिन माँ आपने मुझे ये बात पहले क्यों नहीं बताई
कहीं ये सब आपने मुझसे बाबू जी की वजह से तो नहीं छुपाया। सुमन तुम तो ये अच्छी तरह से जानती हो तुम्हारे बाबू जी ये कभी नहीं चाहते हैं। हमारे परिवार का कोई सदस्य महेता परिवार से रिस्ता रखें। और वो आज भी नहीं चाहते हैं।
हमारे परिवार का कोई भी सदस्य उस घर में जाए। लेकिन मां बाबू जी को इतना कठोर नहीं बनना चाहिए। दादा जी की महेता परिवार से दुश्मनी थीं। वो इस दुश्मनी को कब तक निभाएंगे। अब तो महेता अंकल भी नहीं रहे। उन्होंने और बाबू जी ने तो अपनी खानदानी दुश्मनी को कायम रखा।
लेकिन आप जानती हैं। मैंने और राधा ने कभी इस दुश्मनी को नहीं माना था। इसलिए तो बचपन से राधा मेरी सबसे अच्छी सहेली थी। मां मैं राधा के घर जा रही हूं।क्या आप मेरे साथ चलेगी।
हां सुमन। राधा को शुरु से मैंने अपनी बेटी की तरह माना है। उस दिन मे मां के साथ राधा के घर गई। मेरे आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। मुझे ये समझमें नहीं आ रहा था। के ये सब कैसे हो गया। अभी दो साल पहले ही तो राधा को हमने बड़े प्यार से दुल्हन बनाके इस घर से विदा किया था। और आज मैं राधा को इस तरह देख रही हूं।
उस दिन मैं वहां से किसी तरह घर आ गई थी। गमों से भरें इस पल में हजारों सवाल ऐसे थे। जो मेरे दिल दिमाग में घुम रहे थे। गायत्री मां ही थी जो मुझे इन सवालो के जबाब दे सकती थी
सुबह फिर मैं आयूष के साथ गायत्री मां के पास गई। गायत्री मां मुझे बताईए इन दो सालों में ऐसा क्या हुआ जो मेरी हस्ती खिलखिलाती राधा मोत के अग्रोस में सौ गई।
बेटा सुमन राधा को जब हमने खुशी-खुशी इस घर से विदा किया था। तो हमने नहीं सोचा था। जिसके साथ हम राधा को विदा कर रहे है वो एक अच्छा इंसान नहीं है। वो एक ऐसा इंसान है जो दौलत की लालच में किसी भी हद तक जा सकता है।
बेटा जब से राधा की राकेश से शादी हुई थी। तभी से वो उसे हमेशा पैसे के लिए सताता था। वो ये जानता था। के राधा हमारी इकलोती बेटी है। इसलिए हमारी सारी खुशियां उसी से जुड़ी है। हमारी सारी सम्पत्ती भी उसी की है।
फिर भी वो उसे हमेशा पैसे के लिए सताता था। एक दिन इसी सदमें में राधा के बाबूजी नहीं रहे। इसलिए उस दिन राधा ने मुझे अपनी कसम दी के मैं राकेश को पैसे न दूं।
लेकिन मुझे नहीं मालूम था वो ही कसम एक दिन मेरी राधा की जान ले लेगी। चार महीने पहले जब राधा यहां आई तो वो बहुत बिमार थी। उसने एक बेटी को जन्म दिया। मैं सोचती थी अपनी बेटी के जिन्दगी में आने के बाद शायद राधा ठीक हो जाए।
लेकिन उसने मुझे धोका दिया वो अपनी मासूम बच्ची को रोता बिलखता मेरी गोद में छोड़ कर हमेशा- हमेशा के लिए चली गई।
गाायत्री मां आप रोओ नहीं। सुमन मुझे समझ में नहीं आ रहा है। मैं राधा के बिना कैसे जीऊंगी। मैं बहुत अकेली हो गई हूं।
गायत्री मां आप ऐसा क्यों सोच रही हैं। मैं हूं न क्या मैं आपकी बेटी नहीं हूं। मैं राधा की जगह तो नहीं ले सकती हूं। लेकिन मां आप ही तो कहती थी न राधा और मैं एक दूसरे की परछाई है। मां आज राधा नहीं हैं। तो क्या आपकी सुमन तो है न आपके पास।
उस पल मैं गायत्री मां को समझा तो रही थी। लेकिन उस वक्त मैं खुद अपने आंसू नहीं रोक पा रही थी। लेकिन मैं नहीं चाहती थी गायत्री मां मेरे आसंू देखे इसलिए मैं उनके पास से घर जाने के लिए उठी।
थोड़ी दूर ही बढ़ी थी के मैंने देखा एक पलंग पर एक बच्ची सौ रही है। उसका चहेरा कपड़े से ढक़ा था। वो राधा की बेटी थी। मैं चाहती थी। मैं उसके चहरे पे से कपड़ा हटा कर देखू के वो कैसी दिखती है मेरी राधा की बेटी।
लेकिन मेरी हिम्मत ही नहीं हो रही थी के मैं उसे देख लूं। और मैं घर आने के लिए आगे बड़ी ही थी। कि उस बच्ची ने नींद में जो हाथ चलाया तो उसके चहरे से कपड़ा खुद व खुद हट गया। शायद वो बच्ची भी नहीं चाहती थी के मैं उसे देखे बिना जांऊ और फिर मैं भी अपने आपको रोक नहीं पाई और जाकर उसके पास बैठ गई। और उसके नाजूक से कोमल हाथों को अपने हाथ में लेकर उसे देखती रही।
इतने में गायत्री मां ने मुझसे आके कहा। सुमन..। गायत्री मां ये राधा की बेटी है। हां सुमन ये राधा की बेटी परी है। जब राधा के घर बेटी हुई थी तो राधा तुम्हें बहुत याद कर रही थी। सुमन मुझसे अक्सर कहा करती थी। राधा कभी तुम्हारे घर बेटी हो तो उसका नाम परी रखना।
गायत्री मां मैं तो राधा से ये भी कहती थी। वो मेरी हर खुशी गम में मेरा साथ देगी लेकिन आज जब मेरी जिन्दगी में सबसे बड़ी खुशी आई तो वो मुझे अकेला छोडक़र इतनी दूर क्यों चली गई।
उस दिन के बाद से परी की वो मासूमियत मुझे अपनी तरफ खिचती ही चली गई। मैं दोनों परिवार के बीच की दुश्मनी को भुलाकर अक्सर राधा के घर जाती और गायत्री मां के साथ परी का ख्याल रखती।
परी की मासूमियत को अपने आँचल की छावं में खिलाते हुए दिन कब गुजर गए पता ही नहीं चला। अब मुझे मुम्बई भी वापिस जाना था।
मैं मां-बाबूजी से मिलने के बाद आखरी बार गायत्री मां से मिलने जाना चाहती थी। मां-बाबूजी मैं जा रही हूं। बाबूजी मैं जानती हूं। राधा के घर जाकर मैंने आपका बहुत दिल दुखाया है। मैं क्या करूं मैं अपने आपको रोक ही नहीं पा रही थी।
हो सके तो मुझे माफ कर देना। और मेरी आंख में आंसू आ गए। नहीं सुमन तुम मत रोओं तुम जानती हो मैं तुम्हारी आंखों में आसूं नहीं देख सकता हूं। मैं जानता हूं बेटा मेरी बेटी कभी कोई ऐसा काम नहीं करेगी। जिसके वजह से उसे कभी अपने बाबूजी या किसी और के सामने शर्मींदा होना पढ़े।
बेटा तुमने जो किया ठीक किया। दुख में किसी के काम आना ही इंसानियत हैं। बाबूजी आपने ऐसा कहकर मेरे दिल से बहुत बड़ा बोज उतार दिया हैं।
सुमन तुम चाहों तो जाते-जाते गायत्री जी से मिल सकती हो। सच बाबूजी। शुक्रिया अच्छा मैं चलती हूं। घर से मैं सीधे गायत्री मां के पास गई। गायत्री मां ये जानकर बहुत दुखी थी मैं जा रही हूं।
सुमन तुम जा रही हो। कभी तुम भी चली गई तो मैं कैसे जीऊंगी। गायत्री मां आप ऐसा क्यो कह रही है। मैं आपके पास जीने की उम्मीद छोडक़र जा रही हूं।
नहीं सुमन अब मैं ज्यादा दिन नहीं जी पाऊंगी। नहीं गायत्री मां ऐसा मत कहिए। आपको जीना है परी के लिए उसकी खुशी के लिए। सुमन मैं परी के लिए जीना चाहती हूं। लेकिन गमों ने मुझे तोड़ कर रख दिया हैं। मैं इस तरह नहीं जी पाऊंगी।
सुमन तुम मुझसे एक वदा करों कभी मुझे कुछ हो गया तो तुम मेरी परी का ख्याल रखोगी। क्योकि मुझे अपने बाद एक तुम ही हो जिसपर पुरा भरोसा कर सकती हूं।
गायत्री मां आप ऐसा क्यो कह रही है। आपको अभी बहुत जीना हैं। आपको तो हमारी परी को अपने हाथों से दुल्हन बनाना होगा। देखिए अब मेरे जाने के बाद ऐसा मत सोचना और अपना और परी का ख्याल रखना।
मैंने आयूष को कह दिया हैं। वो यह आता रहेगां। अच्छा अब मैं चलती हूं। मैं गायत्री मां के घर से निकली ही थी किसी ने मुझे पीछे से अवाज दी। सुमन..। अविनाश तुम यहां। हां मैं। तुम तो मुझे भुल ही गई हो। नहीं अविनाश ऐसी बात नहीं हैं । तो क्या बात हैं?
हमारी मांगनी के बाद तुम पहली बार विदिशा आई और मुझसे मिले बिना ही वापिस जा रही हो। मैं कितनी बार तुमसे मिलने घर गया। तुम से मुलाकात नहीं हो पाई। अविनाश ऐसा मत कहो जब मैं यहां आई थी तो मैने तुमसे मिलने की कोशिश की थी। लेकिन हमारी किस्मत में मिलना लिखा ही नहीं था। इसलिए हम नहीं मिल पाए। आज देखों किस्मत ने हमें मिला ही दिया।
मैं इस तरह से मुम्बई वापिस आ गई। लेकिन मुझे अक्सर परी की चिन्ता लगी रहती है। न जाने गायत्री मां अकेले कैसे परी का ख्याल रखती होगी। आयुष मुझे हमेशा उनकी खबर देता रहता था। मेरे आने के बाद से गायत्री मां अक्सर बिमार रहती थी। मुझे उनकी चिन्ता लगी रहती थी।
इसके साथ ही मैं अपनी मंझील पाने के लिए भी महेन्त करते हुए। हर एक नई सफलता को हासिल कर रही थी। और महेन्त करते जा रही थी। मेरी महेन्त का फल भी मुझे मिल रहा था।
एक दिन आयूष का फोन आया । सुमन दीदी गायत्री मां बहुत ज्यादा बिमार है। वो आपसे मिलना चाहती है। मैं जब गायत्री मां से मिलने जा रही थी तो मैने ये नहीं सोचा था। अब जो होने वाला था। उस सब से मेरी जिन्दगी में एक ऐसा तुफान आएगा जो मुझे मेरे आपनों से इतना दूर ले आयेगा।
आज मैं उनसे मिलने के लिए तड़पती रहूंगी। मैं उस दिन गायत्री मां से मिलने पहुंची। गायत्री मां। सुमन तुम आ गई। शायद मेरी सासे तुम्हें देखने के लिए ही आटकी हुई थी। गायत्री मां ऐसा मत कहिए आपको कुछ नहीं होगा। नहीं सुमन अब मैं नहीं रूक सकती हूं।
सुमन तुम मेरी आखरी इच्छा पुरी करोगी। मेरी ही नहीं राधा की भी यही आखरी इच्छा थी। राधा यही चाहती थी उसकी बेटी कभी अनाथअश्राम में नहीं पले और मैं भी यही चाहती हूं। परी मेरे बाद अनाथअश्राम में नहीं पले।
सुमन क्या तुम मेरी परी की जिम्मेदारी लेकर उसे मां का प्यार देओगी। देखो सुमन इंकार नहीं करना। मैं जानती हूं एक तुम ही हो जो मेरी परी को मां का प्यार दे सकती हो। उसको वो सारी खुशियां दे सकती हो जिसकी वो हकदार है।
सुमन मैं जानती हूं तुम परी को बहुत प्यार करती हो। तुम इंकार नहीं करोगी। लेकिन गायत्री मां । इससे पहले मैं गायत्री मां से उस दिन कुछ कह पाती वो परी को मेरी गोद मे देकर हमेशा के लिए मुझ पर परी की जिम्मेदारी देकर चली गई थी।
गायत्री मां के जाने के बाद मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था मैं क्या करूं। जब से बाबूजी को इस बात का पता चला था वो मुझसे तो कुछ नहीं कहते लेकिन अक्सर मुझसे नराज से रहते थे। मुझसे बाबूजी की ये बैरूखी सेही नहीं जा रही थी। और मुझे परी को भी अकेला छोडऩे का दिल नहीं हो रहा था।
इसी कसमाकश में दिन ढलते जा रहे थे। एक दिन आयूष ने मुझसे आकर कहा दीदी कोई वकील सहाब आपसे मिलने आए हैं। सुमन जी मैं गायत्री जी का वकील हूं। उनकी वासियत आपके पास लेकर आया हूं। गायत्री मां की वासियत आप मेरे पास क्यों लेकर आए है।
क्योकि सुमन जी गायत्री जी ने आपनी सारी सम्पति अपनी नाती परी के नाम की हैं। और जब तक परी बालिग नहीं हो जाती है। इस सम्पति और परी की पुरी जिम्मेदारी आपको सोफी है।
अभी परी आपके पास ही हैं। कभी आप चाहे तो इन कागजों पर साईन कर के परी की सारी जिम्मेदारी ले सकती है। इस स्थिति में परी कानूनी तोर पर आपकी बेटी कहलाने का अधिकार रखेगी। और कभी आप परी की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहती है तो मजबूरन हमे परी को अनाथअश्राम में छोडऩा होगा।
उस वक्त मेरी आंखों के सामने गायत्री मां का ही चहेरा घुम रहा था। ऐसा लग रहा था। वो मुझसे कह रही हो सुमन मुझे उम्मीद है तुम मेरी परी की जिम्मेदारी लेकर उसे एक मां का प्यार देगी। सुमन मैं नहीं चाहती हूं मेरी परी अनाथअश्राम में पले।
उस वक्त मैने उन कागजों को लेकर उनपर साईन करना चहा था। लेकिन बाबूजी ने मेरे हाथ से वो कागज लेकर फैक दिए और कहा सुमन तुमने बहुत अपने मन की कर ली लेकिन अब और नहीं बहुत हो गया है।
सुमन तुम नहीं जानती हो उस घर के लिए जब भी हमने कुछ अच्छा किया है। हमे दुख के सिवा कुछ नही मिला है। सुमन तुम नहीं जानती हो उस परिवार के लोगों ने तुम्हारे दादाजी को कितनी तकलीफ पहुंचाई है।
बाबूजी ने तो हमेशा उस परिवार का भला ही चहा था। लेकिन उन्होने बाबूजी को दुख के सिवा कुछ नहीं दिया। सुमन मैं नही चाहता हूं तुम उस परिवार की बेटी की जिम्मेदारी लो। मेरे जीते जी मैं कभी ऐसा नही होने दुंगा।
लेकिन बाबूजी दादाजी ने भी तो हमेशा उस परिवार का भला ही चहा था। और बाबूजी पहले जो कुछ हुआ। उसमें इस बच्ची का क्या कसूर है इसे क्यों सजा मिले। सुमन की मां समझाओ इसे अभी इसके पास इसका पूरा भविष्य है। अभी इसकी अभिनाश से मंगनी हुई है। क्या उसके परिवार वाले इसे इस बच्ची के साथ अपनायेगें।
हां सुमन तुम्हारे बाबूजी ठीक कह रहे है। अब तुम्हारी अविनाश से शादी होने वाली है। बेटा तुम्हारा एक फैसले से सब कुछ खतम हो सकता है। हम तुम्हारे भले के लिए कह रहे है। मान लो हमारी बात बाबूजी ने उस वक्त परी को लाकर वकिल सहाब को दे दिया। आप ले जाईए इस बच्ची को यहां से हमारी बेटी इस बच्ची की जिम्मेदारी नही ले सकती है।
परी के जाने के बाद मैं अपने आप को सभाल नहीं पा रही थी। सच तो ये था। मैं नहीं चाहती थी कि परी मुझसे दूर जाए। हां मैं परी की मां बनके उसको वो सारी खुशियां देना चाहती थी। जिसके सपने कभी राधा ने देखे थे।
लेकिन ऐसा कर के शायद मैं अपनी जिन्दगी का सबसे बड़ा फैसला करने जा रही थी। वो फैसला जो मेरे अपनो और उनकी खुशियों से जुड़ा हुआ था। लेकिन मेरे दिल में एक डर था। कही ऐसा न हो परी की खुशियों की खातीर मैं अपनों की खुशियों को न बिखरा दूं। लेकिन मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था परी मासूम चहेरा मेरी आंखों के सामने घुम रहा था। इसलिए मैंने ये फैसला लिया था। के मैं परी के बचपन और भविष्य को बचाने के लिए वो सब करूंगी जो उसकी मां राधा करती। और मैने अपने दिल पर पत्थर रखकर परी की जिम्मेदारी लेने का फैसला लिया।
मैं जानती थी मेरे एक फैसले से मेरी सारी खुशियां मेरे अपने मुझे छिन जाएगे। शायद मैं अविनाश को भी हमेशा-हमेशा के लिए खो दूंगी। लेकिन अब मैं पीछे नहीं हट ना चाहती थी बाबूजी को मेरे इस फैसले से बहुत बुरा लगा था। उन्होंने मुझसे कह दिया था। के मैं परी और अपने अपनों में से किसी एक को चुन लू। उस वक्त मुझे समझ में नहीं आ रहा था मैं क्या फैसला करूं। मुझे दोनो ही तरफ अपनी हार नजर आ रही थी। मैं अपने आपनों के बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी। लेकिन दूसरी और मैं परी को भी इस तरह अकेले नहीं छोड़ सकती थी। इसलिए मैंने परी को लेकर इस उम्मीद के साथ घर छोडऩे फैसला लिया। के एक दिन मैं लोट कर दुवारा आऊंगी।
आज चार साल बाद मैं अपने आपसे किये उसी वादे को पुरा करते हुए अपने आपनों के पास लोट रही हूं। इस उम्मीद के साथ शायद बाबूजी अब मेरे जज्बातों को समझ सके और मुझे माफ कर दे। मैं बाबूजी को आज अहसास दिलाना चाहती हूं। आज मैं परी की जिम्मेदारी लेकर बहुत खुश हूं।
आज भी परी मेरे साथ है। वो सुबह से कह रही थी। ममा हम कहा जा रहे है? मैने जब उससे कहा हम उसके नाना जी के घर जा रहे है तो वो बहुत खुश हुई। और मैं यही चाहती हूं की परी इसी तरह से जिन्दगी में हस्ती मुस्कुराती रहे।
यादों के साये में चलते-चलते हम कब विदिशा पहुंच गए पता ही नहीं चला। मैं परी गोद में लेकर घर की तरफ बढ़ रही थी। उसके मासूम सवाल कभी मेरे दिल को मुस्कुराते थे तो कभी मेरे दिल की बैचेनी को और बढ़ाते थे।
लेकिन परी के उन सवालों ने ही मेरे दिल में उम्मीद की एक नई किरण दिखाई थी। मैंने जैसे सोचा था वैसे ही किया घर पहुंचने के बाद मैंने खिडक़ी से परी को मां-बाबूजी को दिखा कर कहा परी देखो वो तुम्हारे नाना-नानी है। अब आप उनके पास जाओं ममा आपको यहां से देख रही हैं।
लेकिन नाना जी को ये नहीं बताना ममा यहां खड़ी है। मैं बहार से परी को देख रही थी। किस तरह मां-बाबूजी उसको देखकर हैरान हैं।
इतने में वहां आयूष आ गया। सुमन दीदी और मेरे गले लगकर रोने लगा। इतने सालों बाद अपने भाई को देख कर मैं भी अपने आंसू नहीं रोक पाई। बाबूजी ने अंदर से कहा आयूष कोन हैं बहार? चलिए दीदी अंदर। नहीं आयूष मुझे डर लग रहा हैं। आयूष ने मुझे हाथ पकडक़र अंदर ले गया।
सुमन…परी मेरे पास आकर खड़ी हो गई। मेरी आंखों से आसूं नहीं रूक रहे थे। बाबूजी-मां मुझे माफ कर दिजिए मेरी गलती माफी के काबिल नहीं हैं। लेकिन बाबूजी ये मेरी पहली गलती है। बाबूजी आज एक बार मुझे माफ कर दिजिए मैं दुवारा कभी आपका दिल को दुखाने वाला काम नहीं करूंगी।
सुमन की मां इससे कह दो यहां से चली जाए। चार साल पहले जब ये यहां से गई थी तो इसने सोचा था इसके इस तरह से यहां से जाने के बाद हमारा क्या होगा। आज ये यहां क्यों आई हैं? ये देखने हम इसके बिना जिन्दा है या मर गए है।
नहीं बाबूजी ऐसा मत कहिए। मुझे माफ कर दिजिए। आपकी बैरूखी मेरा दिल बारदाश नहीं कर पाएगा। मैं मर जाऊंगी बाबूजी। मैं इस तरह आपको नराज कर के नहीं जी पाऊंगी।
इतने दिन से मैं इस आस पर जिन्दा थी। एक दिन मैं आपके पास आऊंगी और आप मुझे पहले की तरह सिने से लगा लेगें। और मेरी कामयाबी पर मुझे आर्शीवाद देगें।
बाबूजी मुझे माफ कर दिजिए मैने कहा न तुम यहां से चली जाओं। नहीं बाबूजी मैं नहीं जाऊंगी । अब मेरे आसूं थमने का नाम नही ले रहे थे। मुझे इस तरह रोते हुए देख परी भी रोने लगी थी। परी को इस तरह रोते देखकर मैं एक दम बैचेन होकर उसको अपनी गोद में उठा कर उसको समझाने लगी। परी बेटा आप क्यो रो रही हो चुप हो जाओं बेटा। आप जानती है न ममा आपकी आंखों में आसूं नहीं देख सकती है चुप हो जाओं मेरी बच्ची। ममा आप भी तो रो रही है। आप भी चुप हो जाईए। ममा हम वापिस अपने घर चलते है। हां बेटा आप चुप हो जाओ हम अभी घर चलते है।
मैने आखरी बार मां-बाबूजी को हसरत भरी निगाह से देखा। और अपनी आंखों में आंसू लिए घर से बहार आ गई। और सीधे राधा के घर गई। परी बेटा ये आपका घर हैं। इधर आओं परी इस तस्वीर को देखों बेटा ये आपकी मां हैं राधा मां और ये आपके नाना-नानी हैं।
लेकिन राधा की तस्वीर को देखकर मैं अपने आपको रोक नहीं पाई थी। राधा मैं हार गई। मैं हार गई राधा मैं तुम्हारी बेटी को वो सारी खुशियां नहीं दे पाई हूं। जिस पे उसका हक था। गायत्री मां में आपसे किये वादे को नही पुरा कर पाई। शायद परी को उसके नाना-नानी का प्यार कभी नहीं मिल पाएगा।
जिस दिन मैने राकेश को सजा दिला कर राधा को इंसाफ दिलाया था। उस दिन मुझे ऐसा लगा था अब मैं कभी नहीं हार सकती हूं। लेकिन गायत्री मां आज मै हार गई अपने अपनों से हार गई। मैं हार गई…। मैं अब अपने आपको नहीं रोक पा रही थी। आज मैं इतना रोना चाहती थी के मेरे आंसूओं का दरिया बन जाए और मैं उसमें समा जाऊं।
नहीं सुमन मेरी बेटी कभी नहीं हार सकती है। बाबूजी आप यहां राधा के घर में। हां सुमन आज तुमने मुझे ये अहसास दिला दिया हैं। नफरत से इंसान कुछ नहीं हासिल कर सकता हैं। तुम जीत गई हो मेरी बेटी। चलो बेटा अपने घर चलो। बाबूजी…। आपने मुझे माफ कर दिया। इससे बड़ी मेरे लिए कोई खुशी नहीं हो सकती है।
सुमन तुम नहीं जानती हो इन चार सालों में हम ही नही कोई और भी है जिसने तुम्हारा बैसवरी से इन्तजार किया है। ये उसी का इंतजार था जो तुम्हें दुवारा यहां ले आया। आओ बेटा मैं तुम्हें उससे मिलाता हूं। ये उसी का प्यार हैं जिसने आज तुम्हें यहां रोका हैं।
अविनाश…। मंैने देखा अविनाश परी को अपनी गोद में लेकर खड़ा था। और कह रहा था। सुमन तुमने मुझे यही सिखाया है। अपने लिए तो सभी जिन्दगी जीते है लेकिन जो दूसरों की खुशी के लिए जिन्दगी जीता है। उसी को जिन्दगी का सही मुकाम हासिल होता है।
लेखिका- सैयद शबाना अली
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